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अचानक अधिसूचना से बढ़ी सियासी हलचल
देश की राजनीति में उस समय हलचल तेज हो गई जब केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण कानून को अचानक लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। Narendra Modi सरकार के इस फैसले ने संसद के अंदर और बाहर दोनों जगह नई बहस छेड़ दी है। एक तरफ जहां इसे महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे राजनीतिक रणनीति करार दे रहा है। खास बात यह रही कि यह अधिसूचना उस समय जारी की गई, जब संसद में इसी विषय पर संशोधन विधेयक पर चर्चा जारी थी। इस घटनाक्रम ने पूरे मामले को और अधिक जटिल बना दिया है।
‘रूल 66’ के इस्तेमाल पर उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में ‘रूल 66’ का मुद्दा भी आ गया है, जिसे लेकर राजनीतिक गलियारों में तीखी चर्चा हो रही है। जानकारी के अनुसार, इस नियम के तहत अलग-अलग विधेयकों को एक साथ जोड़कर एक प्रस्ताव के रूप में पेश किया जा सकता है। सरकार ने इसी प्रावधान का उपयोग करते हुए महिला आरक्षण, परिसीमन और अन्य संबंधित मुद्दों को एक साथ लाने की कोशिश की। विपक्ष का आरोप है कि यह कदम विधायी प्रक्रिया को प्रभावित करने और बहुमत की कमी को छिपाने के लिए उठाया गया है।
विपक्ष ने सरकार की मंशा पर उठाए सवाल
विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि अधिसूचना जारी करना यह दर्शाता है कि सरकार को विधेयक पारित होने को लेकर संदेह था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने जल्दबाजी में यह फैसला लेकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की है। साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि इस तरह के कदम से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पारदर्शिता पर असर पड़ सकता है। विपक्ष ने इसे ‘रणनीतिक चाल’ बताते हुए सरकार को घेरने की कोशिश की है।
सरकार ने बताया ऐतिहासिक और जरूरी कदम
वहीं सरकार का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है। सरकार का कहना है कि महिला आरक्षण कानून को लागू करना एक ऐतिहासिक और जरूरी कदम है, जिसे लंबे समय से लागू करने की मांग की जा रही थी। सरकार के मुताबिक, अधिसूचना जारी करना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया है, जिससे कानून को प्रभावी बनाया जा सके। इसके जरिए महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उचित स्थान देने का रास्ता साफ होगा।
2027 के बाद लागू होगा आरक्षण प्रावधान
इस कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण सुनिश्चित किया गया है। हालांकि, यह प्रावधान तत्काल लागू नहीं होगा, बल्कि इसे 2027 की जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू किया जाएगा। इसका मतलब यह है कि अभी से इसकी अधिसूचना जारी होने के बावजूद इसका वास्तविक प्रभाव कुछ वर्षों बाद ही देखने को मिलेगा।
सियासी रणनीति या जरूरी प्रक्रिया, बहस जारी
पूरे मामले को लेकर अब भी बहस जारी है कि यह कदम एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति थी या फिर एक जरूरी विधायी प्रक्रिया। जहां एक ओर सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा मान रहा है। आने वाले समय में संसद में इस मुद्दे पर और अधिक बहस होने की संभावना है। फिलहाल, महिला आरक्षण कानून को लेकर देश की राजनीति में नया अध्याय शुरू हो चुका है।
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