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सीजफायर के पीछे छिपी बड़ी रणनीति सामने
मध्य-पूर्व में हाल ही में हुए लेबनान सीजफायर को केवल एक सैन्य समझौता मानना अधूरा होगा। इसके पीछे गहरी कूटनीतिक रणनीति और कई देशों के हित जुड़े हुए हैं। Lebanon में युद्धविराम के बाद अब यह साफ होने लगा है कि इस पूरे घटनाक्रम में क्षेत्रीय स्थिरता से ज्यादा बड़े आर्थिक और रणनीतिक हित दांव पर थे। खासकर वैश्विक तेल आपूर्ति और व्यापार मार्गों को लेकर इस समझौते का महत्व बढ़ जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सीजफायर एक व्यापक योजना का हिस्सा था, जिसमें कई स्तरों पर बातचीत और दबाव की राजनीति शामिल रही।
MBS की कूटनीतिक चाल बनी गेमचेंजर
इस पूरे घटनाक्रम में Mohammed bin Salman की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने सीधे तौर पर कूटनीतिक स्तर पर पहल करते हुए अमेरिका के साथ बातचीत को आगे बढ़ाया। उनका उद्देश्य केवल क्षेत्र में शांति स्थापित करना नहीं था, बल्कि एक बड़े आर्थिक लक्ष्य को हासिल करना भी था। माना जा रहा है कि MBS ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए विभिन्न पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने में अहम भूमिका निभाई।
ट्रंप के साथ बातचीत ने बदला समीकरण
सूत्रों के मुताबिक, Donald Trump और मोहम्मद बिन सलमान के बीच हुई बातचीत इस पूरे मामले में निर्णायक साबित हुई। इस संवाद में ईरान के साथ बातचीत और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कई अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। बताया जा रहा है कि इस बातचीत के जरिए अमेरिका पर भी दबाव बनाया गया कि वह अपनी रणनीति में बदलाव करे। इस कदम ने मध्य-पूर्व की राजनीति में नया मोड़ ला दिया और सीजफायर की राह आसान हुई।
ईरान की शर्तों ने तय किया रास्ता
इस पूरे घटनाक्रम में Iran की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। ईरान पहले से ही यह स्पष्ट कर चुका था कि क्षेत्र में शांति बहाल किए बिना किसी भी बड़े समझौते की संभावना नहीं है। लेबनान में सीजफायर इसी शर्त को पूरा करने की दिशा में एक अहम कदम था। ईरान के इस रुख ने अन्य देशों को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया।
होर्मुज स्ट्रेट खोलना था मुख्य उद्देश्य
विशेषज्ञों के अनुसार, इस पूरी रणनीति का सबसे बड़ा लक्ष्य Strait of Hormuz को सुचारू रूप से चालू रखना था। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और यहां किसी भी तरह का तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण, क्षेत्रीय शांति स्थापित करना जरूरी था, ताकि तेल आपूर्ति बाधित न हो और अंतरराष्ट्रीय बाजार स्थिर बना रहे।
डबल गेम की रणनीति पर भी उठे सवाल
हालांकि, इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सऊदी अरब की रणनीति पर सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि सऊदी अरब ने एक तरफ अमेरिका के साथ मिलकर ईरान पर दबाव बनाए रखा, जबकि दूसरी ओर कूटनीतिक बातचीत के जरिए शांति स्थापित करने की कोशिश भी की। इस ‘डबल गेम’ को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। फिलहाल, लेबनान में सीजफायर के बाद क्षेत्र में स्थिति कुछ हद तक स्थिर जरूर हुई है, लेकिन भविष्य में यह संतुलन कितना टिकाऊ रहेगा, यह देखने वाली बात होगी।
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